मैंने जब इसे चार वेदों के साथ पढ़ा तो बिलकुल उचित बैठा…वेद और टैरो
कार्ड्स-सोचने में बहुत अलग लगता है..कि कैसे एक ईसाई वस्तु और हिंदी वैदिक
वस्तु एक हो सकती है…पर यह सत्य है…अटल सत्य..वेद कि ऋचाओं और टैरो के
कार्ड्स समान हैं…और उसी ज्ञान पर आधारित हैं..जिसे संतों ने खोजा
था…इसका सत्य प्राचीन रहस्यवादी उल्टवासियों में मिलता है…जिन में किसी भी
ज्ञान कि बात को अजीब तरीके से लिखा जाता था..जैसे “मछली उड़ रही है..और
पक्षी बह रहे हैं..”(हिंदी में अनुवादित एक उल्टवासी)..
इसलिए हम इस बात से मुँह नहीं मोड़ सकते कि ज्ञान विदेश से आया हो या जन्मभूमि से आया हो..ज्ञान वही होता है..जो उसका सत्य रूप है…आईये ! इस चमत्कारी वस्तु को अपनायें और इसके सत्य को जाने…”
इसलिए हम इस बात से मुँह नहीं मोड़ सकते कि ज्ञान विदेश से आया हो या जन्मभूमि से आया हो..ज्ञान वही होता है..जो उसका सत्य रूप है…आईये ! इस चमत्कारी वस्तु को अपनायें और इसके सत्य को जाने…”
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